"चिंता चिता समान है और चिंता चिंतन करने से ही जाएगी। "

मैंने  उपरोक्त पंक्ति को ही मेरे जीवन का आधार बनाया है. परिस्थिति  चाहे अच्छी हो या बुरी, मैंने कभी अपना धैर्य नहीं खोया है.  परिस्थिति पर चिंता न करके मैंने चिंतन पर हमेशा ही ध्यान केंद्रित किया है। इसी कारणवश मैंने मेरे ब्लॉग का नाम ही चिंतन रखा है।  आज करीब २-३ साल बाद दोबारा से इस कार्य को आगे बढ़ाने की मंशा हुई है।  

मैं पेशे से एक बैंकर हूँ।  मेरी पृष्टभूमि एक किसान परिवार की है। एक कृषि पृष्ठ्भूमि  से बैंकर होने के नाते मैंने परिस्थियों को काफी नजदीक से देखा है और कई बार समाज में घटने वाली परिस्थियों से अपने आप को अलग कर पाना मेरे लिए संभव नहीं हो पाता।  वहीँ से ही मैंने ब्लॉग लिखने की कल्पना की। 

हम सब समाज का ही हिस्सा हैं।  मनुष्य जीव के बगैर हम समाज की कल्पना नहीं कर सकते। प्रत्येक जीव अपनी क्षमता अनुरूप इस समाज को कुछ न कुछ देता जरूर है  जो कि देने वाले की प्रवर्ति पर निर्भर करता है। अगर हमे समाज को बनाये रखना है तो इसके सामाजिक मूल्यों को भी बना के रखना पड़ेगा।  बिना सामाजिक मूल्यों के समाज की कल्पना करना किसी जंगल में जंगली पशुओं के बीच विचरण करने समान है।  अब जिंदगी बड़ी तेज रफ़्तार से दौड  रही है और इस ज़िन्दगी में मनुष्य को बिना सामाजिक सोच के सिर्फ और सिर्फ अपने को केंद्र में रख कर एक दूसरे से आगे जाने की होड़ में लगा है। 

सबसे पहले हमे ये चिंतन करना चाहिए कि मेरे द्वारा किया गया कार्य / वचन का समाज पर क्या प्रभाव होगा। जिसके लिए हमे ये मालूम होना चाहिए कि इस समाज का हिस्सा कौन कौन है और इस समाज की आवश्यकता क्या है ? 


साथियों इससे आगे का चिंतन आप और हम मिलकर अगले विशेषांक में करेंगे। आप सभी के सुझाव मेरी ईमेल आई डी  sandeep.sheorandadri@gmail.com पर आमंत्रित हैं।  आप के विचार में 
समाज क्या है ?
समाज की आवश्यकता क्या है ?
हम सब मिलकर समाज में क्या सुधर ला सकते हैं और इस दिशा में हमे क्या करना चाहिए ?

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